बाबासाहेब आम्बेडकर और आज का धर्म चिन्तन

बाबासाहब जी व्यक्ति से ज्यादा प्रवृत्ति के विरोधक थे।बाबासाहेब जी को भगवानों से ज्यादा कर्मठ पंडित तथा भगवान के नाम से अपना पेट भरने वाले और अपने मन गढ़ंत गलत नियम बनाने वालों से खतरा लगता था की वह फिर से अज्ञानी जनता को पाखण्ड के नाम पर भगवान के नाम से ग़ुलामी में ना धकेल दें। मुझे व्यक्तिगत यह लगता है सबसे ज्यादा भगवानों का नुकसान किया है तो उनके कुछ स्वार्थी चेलों ने।जो ज्ञान मार्ग और कर्म योग छोड़कर जान बूझकर पाखण्ड और कर्मकांड में लोगों को उलझाते है।आज 60 साल के बाद पढ़े लिखे लोग जो अनपढ़ है उसका ज्ञान सुनने सत्संग में जाते है।अंध श्रद्धा में फंसे है जहां story telling के सिवाय कुछ नहीं होता वह तो साधु है उन्हें विरक्त और साधारण जीवन जीना चाहिए तो जो साधु का वेश धारण किए है उनके 10 हजार करोड़ के आश्रम है।क्यों?।क्योँकि हम आज भी मानसिक गुलाम है।हम स्वयं कोई भी मूल -ज्ञान या ग्रंथ पढ़ना नहीं चाहते ।बाबासाहब ने यह पहचाना था।उन्होंने नफरत नही सिखाई तो जब तक आप काबिल नहीं बनते तब तक दुरी बनाए रखने को कहां। बाबासाहेब सही थे आज भी हम मानसिक गुलाम है ।हम हमें बचाने के लिए कोई अवतार जन्म लेगा इसी आशा में बैठे है।आज कहीं न कहीं तो कमीं है।इसीलिए 60 साल के बाद भी आज दलित समाज बाबासाहेब के बाद उनके जैसे निस्वार्थी और ज्ञानी पढ़े लिखे लोगों को वह लोकनेता नहीं बना सका जो अपने पावर से नहीं विचारों से दुनियां को प्रभावित करता हो ,दुःख इस बात का है बाबासाहेब जैसे हजारो लोग दलित समाज में है लेकिन वह सिर्फ कार्यकर्ता बन सकते है दलित नेता नहीं क्योंकि की समाज आज भी मानसिक गुलाम है।वह सिर्फ चमत्कार या अवतार की राह देख रहा है।समाजसेवी लोगों को सराह नहीं रहा है,यह धार्मिक अंध श्रद्धा का साइड इफेक्ट(मानसिक गुलामी)है।कर्म के मार्ग पर कोई जाना ही नही चाहता।आरक्षण का फायदा जिन्होंने उठाया उनमें एक उच्य वर्ग बन रहा है जो सिर्फ अपने परिवार को लाभ पहुंचाने के बारे में ही सोच रहा है ।जो झोपड़ी में रहनेवाले गरीब से भी गरीब दलित तक लाभ पहुचाना नहीं चाहता ।बाबासाहेब यही वर्ण और वर्ग वादी मानसिकता को बदलना या उच्य-नीचता की सोच को बदलना चाहते थे।नफरत फैलाना नहीं। वह तो सामाजिक अभिसरण चाहते थे।

Advertisements

अनाथों का नाथ फिर भी अनाथ -महात्मा गाँधी

मेरे साथियों !
सब से पहले मै आप का तहे-दिल से
हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।
क्योंकि आप आज……
हिम्मत-जिगर दिखाकर
ऐसे लोकनेता के बारे में
विचार पढने के लिए तैयार हुए,

जिस लोकनेता की अवस्था
इस समाज ने
बेसहारा…,
बेचारा…. ,
असहाय्य…. जैसी की है ।
कट्टरतावादी सामाजिक प्रवाह
मुझे से नाराज होगा…
यह मालूम होते हुए भी,
मै जानबूझ कर….
ऐसे लोकनेता के बारे में
बोलने जा रहा हूँ,

जो आजाद भारत में
सबसे ज्यादा ‘बद-नसीब’…
लोक-नेता रहा।
जिसके पीछे कोई भी
व्यक्ति,नेता,या पार्टी
सच्ची श्रध्दा भावना से
कभी खड़ी नहीं हुई।
उन के नाम पर
गलतफहमिया फैलाई गयी।
हर कोइ उस लोकनेता के नाम
‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ की तरह
इस्तेमाल कर रहा है।
या ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’…. की तरह
उस लोकनेता के नाम को
बरबाद कर रहा है।
जरूरत के हिसाब से
उपयोग में ला रहा है
‘यूज़ एंड थ्रो’…. कर रहा है
उस लोकनेता का फोटो
जिसपर है उस… 500 और
1000 रुपयों नोटों को तो
प्यार से अपनाता है;
लेकिन, व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से…
बड़ी नफरत करता है
ऐसा क्या हुआ ?….
उस लोकनेता ने किया क्या?….
की हम इतनी नफरत करते है ?
उस महामानव ने लोगों को लूटा नहीं….
अपने ‘खानदान को राजनीति’ में
आगे बढ़ाने की कोशिश नही की….
कोई प्रॉपर्टी खड़ी नही की….
देश आजाद होने के बाद
आराम से राष्ट्रपति बन सकते था
लेकिन उस लोकनेता ने राष्ट्रपिता बनाना पसंत किया।
सम्पूर्ण जिंदगी स्वयं व्यक्तिगत रूप से
कोई फायदा नहीं उठाया।
न -अपने सगे बेटे को भी उठाने नही दिया।
क्या, वह… उनकी गलती थी ?
लेकिन वह लोकनेता उस वक्त करोड़ो देशभक्तों के आँखों का तारा था।
आज आजादी के साठ साल के बाद
भारतीय लोगों के अंदर
उस लोकनेता के बारे में
आज जहर… आया कहाँ से ?
इस सब बातों के मूल कारण को…
मै समझता हूं ,मै मानता हूँ।
हम में से स्वयं घोषीत- महाबुद्धिमान
बढ़ते जा रहे है, या
पढ़े लिखे परबुद्धि गवार लोगों का अज्ञान
ज्यादा सुनने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करे .

देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?

*देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?*

आज हम नफ़रत के बारे में माल मसालेदार चर्चा नहीं करेंगे ।समस्या के जड़ तक जाने की कोशिश करेंगे।लगभग ३० साल पहले बचपन में मेरे इतिहास पढाने वाले अध्यापक जी ने एक बात बताई थी “सच्चा अध्यापक वहीं होता है जो संतुलित हो जो सिक्के के दो पहलुओं के साथ समान न्याय कर सके सदा संतुलित रहें।छात्रों को दोनों बाजुओं (पक्षों को )समझाए”।यह नियम सभी विषयों के लिए लागू होता है,लेकिन आज के हमारे समाज का दुर्भाग्य यह है हर बुद्धिवादी अथवा लेखक किसी न किसी विचार धारा से इतना प्रभावित हो गया है की मानो वह सेल्समन बन गया है । उन की आजादी पर मै आज उगली नहीं उठा रहा हूँ क्योंकि उन्हें आजादी का पूरा अधिकार है.मैं उनका पूरा आदर सम्मान करता हूँ। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है की सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी की दिशाहीन करने का काम कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने किया है ।आपने व्यक्तिगत रुचि (like /dislike) को उन्होंने युवकों के उपर थोपा. यह भूल गये की उन्हें सरकार से मिलने वाला लाखो रुपयों का मासिक वेतन अपनी वैयक्तिक विचार धारा को थोपने के लिए नहीं मिलता। किसी विचार धारा का विरोध करने के लिए नहीं मिलता। आप इस देश के अलग अलग विचार धारा के नागरिकों के tax payer के नौकर हो फिर भी उन्होंने उन के साथ गद्दारी की।आज सरकारी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को एक एक कट्टर विचारधारा का अड्डा बना दिया।जो सिर्फ ज्ञान का श्रोत (source )होना चाहिए था ।इन अध्यापकों या प्रोफेसरों का काम न्यायाधीश के भाँती न्याय करना नहीं तो दोनों परस्पर विरोधो विचारों का समझाना था। संतुलित न्याय बुध्दी ही छिन ली इन प्रोफेसरों ने,बाकी बचे अद्यापकों में कई तो भ्रष्टाचार की संतान है ,जो हवा की तरह रुख बदल कर जान बचाते हैं।ऐसा संशोधन करते है जिन किताबों की 25 या 50 प्रिंट निकलती है ।जो उनके अपने घर में ही दिखती है। साल में 10-12 लाखऔर 10 साल में लगभग 1 करोड़ वेतन वालों पेटू लोगों का बॉयोडाटा देखो 10-15 सालों में सिर्फ 4-5 लेख छपवाए होंगे।कुँए में नहीं है तो बाल्दी में कहाँ से आएगा?परिणाम स्वरूप साक्षरों(युवकों का) अज्ञान -निरक्षरों तक पहुँचा आज भारत के ९०% लोगों में जो नफऱतका भाव है।मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।उस का कारण उनका इकतरफा विकास है।लोग समझतें है कि मेरी विचारधारा का विकास तब ही हो सकता है जब मै सामनेवाली विचारधारा से नफरत करूंगा। आज की TV या प्रिंट मिडिया का भी संतुलन बिगड़ गया है वह अपने आप को न्यायाधीश समजने लगें है.।कमजोर इन्सान की तरह सिर्फ एकतरफा बाते करते है.अरे !सुंदर फूलों की माला तभी बन सकती है जब उसमें सभीं रंगों के फुल हो।इसी प्रकार का सरल जीवन होता है.उसे हमने जटिल बनाया है।इतिहास में एक नेता सामाजिक न्याय के लड़ रहा था ,तो दूसरा राजनीतिक न्याय के लिए, तीसरा संस्कृति की रक्षा के लिए।वह सारे लोग/नेता हमें -हर एक को अपनी जगह पर सही दिखाई देंगे जब हम दूसरे रंग के/ या अपने व्यक्तिगत चश्में से नहों देखेंगे।सही ज्ञानी उसी को कहते है जो संतुलित विचार रखता हो।जब यह होगा तब ही समाज समस्या रहित होगा।
-लेखन राजेन्द्र राणे (speechobook@WordPress.com)

तेजोसूर्य -डा. बाबासाहेब आंबेडकर

जब जातीय उच्च-नीचता

एवं विषमता के जहर ने समाज का अन्तरंग

दूषित एवं कलुषित कर डाला था,

एक ही देश में रहकर लोग

एक दूसरे का तिरस्कार करने लगे थे,

देश की सामाजिक एकता

जातियों के हज़ारों टुकड़ों में

खण्ड विखंडित होकर बिखर गई थी,

तब परिणाम स्वरूप भारत

विदेशियों के आक्रमणों में

एक हजार सालों से

लगातार हारता गया।

क्योंकि अखण्ड भारत को

जाति भेद के जहर ने

नाकाम और नपुंसक बना दिया था,

बड़े दुर्भाग्य की

और मूर्खतापूर्ण बात यह है कि

हिन्दुओं ने विदेशी विजातिय बादशाहों की

राजनीतिक गुलामी मंज़ूर की,

लाचार बनकर उनके चरणों में

1000 साल तक पड़े रहें,

लगातार १५० साल तक अंग्रजों के तलुए चाटते रहे

लेकिन उच्चवर्गीय होने का ‘दंभ’

कभी भी नहीं छोड़ा।

अपने ही धर्म के लोगों को,

दीन-दलित आदिवासियों को,

बराबरी का स्थान नहीं दिया।

शूद्र कहते हुए

धार्मिक गुलामी की श्रृंखला में

उन्हें बाँधकर रखा।

अस्पृश्यता या छुआ-छूत की

इस प्रथा के कारण

 ‘इन्सान ने’

‘इन्सान को’

‘इन्सान समझना’ ही छोड़ दिया था।

हिन्दू धर्म की पवित्र विचार धारा को

चातुर्वर्ण्यं व्यवस्था ने कलंकित कर डाला।

देश और धर्म की एकता को

 खंड-विखन्डित कर दिया।

कर्म आधारित अर्थात

श्रम अधिष्ठित समाज व्यवस्था को

मुट्ठी भर स्वार्थी लोगों ने

जन्म आधारित चातुर्वर्ण्य धर्म बना डाला।

तथाकथित कर्मकांड एवं आडम्बरों को

धर्म का जामा पहनाकर

जाति, पंथ, संप्रदाय का खेल शुरू किया।

‘तोड़ो और राज करो’ की नीति

विश्व बन्धुता को

 जिन्दा गाड़कर अपनाई गई।

धर्म का मर्म न समझने वाले

 धार्मिक हो गए।

५०००से ज्यादा जाति उपजाति के टुकड़ों में

इस समाज को बिखेर दिया गया।

अन्न,वस्त्र, निवास, शिक्षा,आरोग्य

तो छोड़ ही दो,

पीने के पानी पर भी

दलितों का अधिकार नही था।

बड़े महलों, तटबंदियाँ,पुल,कुएँ

आदि की नींव में

जिंदा गाडकर उनकी बलि चढाई जाती थी।

ऐसे वक्त एक तेजोसूर्य का जन्म हुआ।

जिसने हजारों सालों की

 गुलामी में जो सड़ रहें थे,

उन दलितों को

गुलामी की श्रृंखला से

मुक्त करने का जिम्मा उठाया।

उनका नाम था-

‘भीमराव रामजी आंबेडकर ‘।

जिसे हजारो शोषितों ने  

प्यार से अपना नाम दिया

‘बाबासाहेब आंबेडकर ‘।

– राजेंद्र राणे.
speechobookhindi.wordpress.com

Ref –
Dr. Babasaheb Ambedkar,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )

All Rights Reserved-Copyright

Dr.Babasaheb Ambedkar

छ.शिवाजी -भारत के ‘हृदय-सम्राट’ थे।

अरे! …..यूरोप के छोटे छोटे देशों के
ऐसे राजा, ….जिन्होंने ज़िन्दगी में
एक या दो लड़ाइयाँ खेली,
उनके उपर बनाए गई
बडी-बडी हॉलीवुड की फिल्मों को
सिर पर रखकर नाच कर
उनके इतिहास को सराहने वाले हम।
जब शिवाजी महाराज जैसे महारथी राजा के
बारे में जब परायेपन का एहसास कराते हैं।
प्रांतीय संकुचितता से या अहंकार से,
उन्हें छोटा दिखने की जब कोशिश करते हैं।
विरोध के लिए सिर्फ विरोध किया जाता है ।
सारी पार्टियों के नेता लोग…….
जब राजनीति की दृष्टि से या स्वार्थ से
शिवाजी महाराज की तरफ देखते हैं-
तो बहुत दर्द होता हैं।
अपनी सड़ी हुई मानसिकता से उन्हें
संकुचितता का शिकार मत करो।
शिवाजी राजा का यह राज्य,
गुजरात के धरमपुर से लेकर-
कर्नाटक के तंजावर तक,
फैला हुआ था।
लेकिन उनसे ही प्रेरणा लेकर
उनके शूर मराठा सरदारों ने
शिवाजी महाराज के
स्वर्गवास के उपरांत १७६० तक
सिर्फ ८० साल के अंदर
मुगल सल्तनत को
नेस्तनाबूद करते हुए…..
संपूर्ण उत्तर भारत में राज्य फैलाया।
जनता के दिल में स्वतंत्रता की भावना को
राजा शिवाजी ने
इस प्रकार प्रज्वलित कर दिया
की औरंगज़ेब द्वारा
उनके पुत्र संभाजी महाराज का
वध कर देने के बाद भी…..
पौत्र शाहू महाराज को कारागार में
डाल देने के उपरांत भी …..
तथा समस्त राज्य को
सैन्य शक्ति द्वारा रौंद डालने पर भी….
मराठों ने स्वतंत्रता बनायी रखी ।
उसी से भविष्य में विशाल मराठा
साम्राज्य की स्थापना हुई।
मैसुर से लेकर बंगाल तक,
उड़ीसा से लेकर
आज के पाकिस्तान के
लाहौर और मुल्तान प्रान्त तक,
वहाँ से-कश्मीर तक,
आज के भारत और पाकिस्तान के
लगभग दो तिहाई इलाके में
मराठों का साम्राज्य फैला हुआ था।
जो ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी
राज तक अस्तित्व में रहा।
उसके सबूत तंजावर, बडौदा, इदौर,
ग्वालियर, झाँसी आदि राजघरानों
के रूप में आज भी विद्यमान हैं।
इस विशाल मराठा साम्राज्य का
बीज बोया था छत्रपति शिवाजी नें।
इसी लिए मै दावे के साथ कहता हूँ ….
शिवाजी महाराज भारत के ‘हृदय-सम्राट’ थे ।
इस देश के आन-बान,
और शान के प्रतिक थे।
– राजेंद्र राणे.
speechobookhindi.wordpress.com
Ref –
Shivaji Maharaj,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )
All Rights Reserved-Copyright

शिवाजी महाराज और उनकी प्रशासन व्यवस्था.

प्रशासक के रुप में शिवाजी महाराज ने
अपने अधिकारों का गलत उपयोग
कभी नहीं किया।
आप सभी को मालूम हैं
एकाधिकारशाही या हुकुमशाही यह
निरंकुश शासन व्यवस्था का विक़ार लाती हैं।
उस वक्त के सारे राजा, महाराज, बादशाह
एवं सम्राटों को इस ने ग्रस्त किया था।
दुनियाँ के इतिहास में
यह पहले सत्ताधीश थे।
जिसने अपनीही सत्ता का
विकेंद्रीयकरण किया था।
चुने हुये विशेषज्ञों द्वारा शिवाजी महाराज ने
‘राजव्यवहार कोष’ नामक शासकीय
शब्दावली का शब्दकोष तैयार कराया था।
यह महाराज की परिपूर्ण व्यकित्व
और प्रगल्भता का परिचायक है।
उसके अनुसार उन्होंने
प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए
आठ मंत्रियों की परिषद बनाई।
जिसे अष्ठ प्रधान मंडल
कहा जाता हैं,
‘पेशवा’
मंत्रीमंडल के प्रमुख होता  था
‘अमात्य’
वित्त और राजस्व कार्य संभालता था।
‘सचिव’
राजा के पत्राचार तथा दफ़्तरी-कार्य करता था।
मंत्री / वकनीस / विवरणकार
राजा का रोज़नामचा रखता था।
सूचना, गुप्तचर एवं संधि-विग्रह के
विभागों का अध्यक्ष होता था और
घरेलू मामलों की भी देख-रेख करता था
‘सुमंत’
विदेशी मामलों की देखभाल करते हुए
विदेश मन्त्री का कार्य करता था।
‘सेनापति’
सेना का प्रधान होता था।
सेना में सैनिकों की भर्ती करना,
संगठन एवं अनुशासन और साथ
ही युद्ध क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती
‘पंडितराव’
धार्मिक मामलों का मंत्री था।
अनुदानों का दायित्व निभाता था।
‘न्यायाधीश’
न्यायिक मामलो के प्रधान था ।
प्रत्येक प्रधान की सहायता के लिए
अनेक छोटे अधिकारियों के अतिरिक्त
‘दावन’, ‘मजमुआदार’, ‘फडनिस’, ‘सुबनिस’,
‘चिटनिस’, ‘जमादार’ और ‘ पोटनिस’
नामक आठ प्रमुख अधिकारी भी होते थे।
आज के जमाने के किसी भी देशों के
सविधान के बराबरी का संविधान
और कैबिनेट और राज्य मंत्रीमंडल
शिवाजी महाराज ने बनाया था ।
शिवाजी ने शासन की सुविधा के लिए
‘स्वराज’ कहे जाने वाले विजित प्रदेशों को
चार प्रान्तों में विभक्त किया था-
इस के उपरांत
हर प्रान्त के ‘सुबेदार’ को
‘प्रान्तपति’
कहाँ जाता था।
उस के पास गाँव की
अष्ट प्रधान समिति होती थी।
हर प्रांत में
अनेक गाँव होते थे।
हर गाँव में
एक ‘मुखिया’ होता था।
हर गाँव से तीन प्रकार के
राजस्व एवं कर
वसूल किए जाते थे।
‘भूमि-कर’, ‘चौथ’ एवं ‘सरदेशमुखी’,
इन में से किसानों को सिर्फ
भूमि-कर देना पड़ता था।
शिवाजी स्वयं एक सत्ताधीश होते हुए,
उन्होंने सामन्तवाद को जड़ से नष्ट करने हेतु,
अपरोक्ष रूप से कोशिश की थी।
राज्य का मालिक स्वयं को न समझकर
ईश्वर को समझते थे।
राज्य के सभी सैनिक,अधिकारी,सरदार,एवं
मंत्री ‘वेतानधारी’ होते थे।
शिवाजी इतनी समर्पक ‘वेतन-प्रणाली’
आज तक किसी राजा ने इतनी
असरदार और परिणाम कारक पद्धति से
अमल में नहीं लाई  थी।
                       – राजेंद्र राणे.
Ref –
Shivaji Maharaj,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )
All Rights Reserved-Copyright

छ.शिवाजी – क्यों है सर्वश्रेष्ठ?

छ.शिवाजी ही है इसीलिए सर्वश्रेष्ठ.
जब उस वक्त- भारत-वर्ष के
बाकी सारे राजाधिराज,
चक्रवर्ती, सम्राट, बादशाह या नबाब
सारी जिन्दगी,  अधनंगे, भूखे, लाचार,
कंगाल, जनता जनार्दन के उम्मीदों का
गला घोंटकर, उनकी पसीने की कमाई
निर्लज्यता से उड़ा रहें थे।
तब
सह्याद्री पर्वत के जंगलों में १६ वर्ष का
शिवाजी भोसले नाम का नौजवान,
रोहिडेश्वर के मन्दिर में,
आज़ादी की प्रतिज्ञा ले रहा था।
स्वयं की करंगुली काटकर,
अपना खून बहाकर,
धरती को दुल्हन की तरह
सजाने की कोशिश कर रहा था।
बार-बार की लड़ाइयों के कारण,
सारे गाँव-शहर, जलकर
भस्म हो गए थे,
खंडहर बन गए थे,
उन में जंगली जानवरों का संचार था,
जिस पुणे शहर में, विदेशियों ने
गधे से हल चलाकर,
किसानों की परंपरा को
ज़िन्दा जलाया था।
अपमानित किया था,
उसी पुणे शहर में
सोने का हल चलाकर,
शिवाजी महाराज ने उन किसानों को
स्वाभिमान की भाषा दी।
मन से मरे मराठों के तन-मन में,
नव चेतना जागृत की।
विदेशियों की गुलामी करने वाले,
मुजरा या लावणी के घुंगरू से भी
घायल होनेवाले, नौजवानों के नसों में,
लाचारी एवं अगतिकता के कारण।
खून नाम का पानी दौड़ रहा था,
उसे बाल शिवाजी नाम की
चिंगारी ने डफली की थाप
और तलवार की खनखनाहट में
खौल कर बहने वाला खून बना दिया।
उनका ‘हिन्दवी‘…. शब्द का अर्थ
विरोध प्रदर्शक नहीं था,
वह सर्व-समावेशक था।
जहाँ मुगलों के सत्ता-पिपासु शहज़ादे,
सत्ता सुन्दरी के उपभोग के लिए,
अपने जन्मदाता के खून के भी प्यासे थे।
भाई-भाई का गला काटकर
रक्त रंजीत इतिहास बना रहा था।
धन संपत्ति को बनाए रखने के लिए,
विजातीय एवं विदेशी शत्रुओं से भी
बहनों एवं बेटियों की शादियाँ रचाकर,
रिश्तेदारी की घिनौनी परंपरा
वफ़ादारी से निभाने वाले तथाकथित
खानदानी  यहाँ पनप रहे थे।
जब धर्म का अर्थ
धन संपत्ति के लिए, स्व एवं परधर्मियों
की जान लेना बन गया था,
तब शिवाजी महाराज ने
जान के लिए जान देने का
स्वराज धर्म सिखाया।
………………
……………..speech by राजेंद्र राणे
Ref –
Shivaji Maharaj,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )
All Rights Reserved-Copyright
https://www.youtube.com/watch?v=MqjV2gEdIHg