बाबा राम रहीम जैसे साधुओं को कौन बनाता है  शैतान ? 

बाबा राम रहीम जैसे साधुओं को कौन बनाता है  शैतान ?….. जिस के पास 10 हजार करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टी है 1 करोड़ से ज्यादा भक्त  हो,  गुंडों को फ़ौज हो,  नेता औऱ पुलिस  जिसके  चरण स्पर्श करते चरणों में बैठे हो फिर भी कुछ काम नहीं आया क्योंकि अहंकार  से उसने अधर्म का मार्ग चुना एक गरीब  शोषित निराधार लड़की के दर्द (श्राप * १५ साल पहले  प्रधानमंत्री को लिखे हुए एक पत्र ने) ने बाबा राम रहीम (हरियाणा डेरा सच्चा सौदा ) को जेल पहुँचा दिया । एक बड़े बूढ़े  साधु  के बाद यह दूसरी घटना। साधुओं के बारे में यह ज्यादा इसी लिए हो रहा है क्योंकि बिना मेहनत से किसी पुराने  अच्छे और सच्चे सम्प्रदाय के नाम पर  उसका प्रमुख बनते ही आसानी से मिलनेवाली सत्ताऔर  संपत्ति के नशे में वह अहंकारी घमंडी बनकर दूसरों का आर्थिक, मानसिक, शारीरिक शोषण करते है। लेकिन एक सच्चा प्रामाणिक- घास के टुकड़े जैसा, छोटा- सा गरीब आदमी /औरत सामने खड़ा होता/होती है तब इन की लंका  का दहन होता है।
इन कांडों में लिप्त तथाकथित साधुओं के सभी सम्प्रदाय के विचारों को उदाहरण के तौर उन्हें- ही बताना चाहूंगा कि उन बड़े शोषक लोगों को भगवान भी साथ नही देता क्योंकि उन पापी की स्वयं की अंतरात्मा को सत्य मालूम होता है वह कभी  बुराई षडयन्त्र का साथ नहीं देती  सिर्फ वही भगवान से संपर्क का सही- एकमात्र साधन है ,उस से ही भगवान को संदेश पहुंचता  है।  इन तथाकथित साधु संतों के शिकार सिर्फ भोले ,सज्जन, और धार्मिक लोग होते है जो उन बड़े  शोषक लोगों से भी पुण्यवान होते है उनका दर्द कहो,बद्दुआ कहो या श्राप वह जरूर जल्दी नुकसान कराता है।  क्योंकि उनका विरोध एक सच्चा इंसान कर रहा होता है।गीता में भी कहा है कि हजारों अधर्मी लोगो की हत्या का कर्म (पाप)आत्मा को नहीं चिपकता लेकिन एक सतमार्गी को मन से , वाणी से अथवा तन को भी दिया हुआ दर्द हमारी आत्मा को मलिन कर देता है।( हमें नष्ट कर कर देता है।)  मैंने जितने मूल धर्म ग्रन्थ पढ़े है उसके धर्म चिंतन के अनुसार मैने महसूस किया है कि हमारी नियत -नियति का निर्माण करती है।………नियति परिवर्तन लाती है।……..हर परिवर्तन संकल्प के अनुसार फल निर्माण करता है।……हर फल संकल्प की पवित्रता के अनुसार परिणाम देता ही है।.. …. जब कालचक्र शुरू जब होता है  परिवर्तन  की आहट देता है। अस्थिरता ,चंचलता का दौर शुरू होता है……. जो इसे समझता है।वही ज्ञानी … गलतियों को सुधारकर .. सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर।इस में से  बच  जाता है । इन सारी  घटित घटनाओं से बहुत सारे अनीति के मार्ग पर अभी भी चलने वाले कुछ  सीख ले।15 साल हो या 20 साल भगवान के घर देर है अंधेर नही।वह दिन जब आएगा तब पछतावा करने से कुछ नही होगा।यह …..मैं नही …उनके सम्प्रदायों  के महान ग्रंथ बता रहे है। 
एक सफल सर्वमान्य डॉक्टर , इजीनियर, या प्रोफेसर बनने के  लिए 40 उम्र कट जाती है लेकिन साधु बनकर 100 -500 साल पुराने एक बड़े सम्प्रदाय का प्रमुख 10 या 20 साल के  कच्चे उम्र में आसानी से बना जा सकता है इसी कारण अपरिपक्व,कच्चे और अज्ञानी के  हातों अपार पावर आती है तो उस से  गलतियां होगी ही उसमे उसकी नहीं गंवार अंध भक्तों की गलती है।जो योगी को भोगी बनने की लत लगाते है। भारत की प्राचीन ऋषि परम्परा में नही होता था पहले ज्ञान,तप, के बाद  परिपक्व अनुभवी बनने के बाद उम्र के 50-60  साल के बाद  आश्रम या सम्प्रदाय प्रमुख का पद मिलता था।लेकिन आज वृद्ध,पुराने अनुभवी  साधुओं को कोई नही पूछता और संख्या बल से गलत लोग  आश्रमों के प्रमुख बन रहे है।

यह सर्वकालीन सत्य है कि जो विरक्त होता है वहीं साधु होता है लेकिन जहां धन -सम्पत्ति -सत्ता का सम्पर्क होगा वहां शैतानी साये (घमण्ड, अहंकार, क्रोध,मोह, माया,मत्सर) का करंट लगेगा ही ।उनकी भी कोई गलती नही अरे गलती हमारी है जो  गुरु को गुरु (Teacher साधन/माध्यम) नहीं -इन तथाकथित गुरुओं को उनके चेले चपाटे जो परप्रकाशीत ,अंध भक्त  है वह भगवान बनाने में लगे हुए है। इस देश के 10 हजार साल के इतिहास में लाखों ऋषि ,संत हुए लेकिन किसी ने आपने आप को जीते जी भगवान घोषित नहीं किया।वह भक्त बने रहे।उनके स्वर्गवास के बाद लोगो ने  भगवान माना यह अलग बात है।लेकिन आज 50 -60 सालों में  स्वयं घोषित भगवान की बाढ़ सी आ गई है । हम अन्धश्रद्धा लिप्त जनता लालच में आ-कर स्वर्ग का टिकट खरीदने अथवा अपना पाप छुपाने अमर्याद रूप से उन्हें दान  देती है तब उस की  ही नशा से वह बिगड़ जाते है जिम्मेदार हम है धर्म मार्ग को चलनेवालों को अधर्मी बनाने के लिए। 

भारतीय संस्कृति की अनुसार उन्हें विरक्त,परीत्यागी, संन्यासी रहना  ही है  जो मार्ग उन्होंने स्वयं चुना है अपनी अकल चलाकर उन्हें राजभोगी अमर्याद सत्ता से उन्मत्त मत बनाओ।प्रकृति का नियम है हर एक्शन की रिएक्शन होती  है।वह उनपर भी लागू है,  जो बिना जरूरत दोगे तो विकार जगेंगे ही।यदि आप को दान देना ही है तो जरूरतमंदों को,गरीबों को दो,समाजसेवी संस्थाओं को दो।भगवान मंदिरों से ज्यादा गरीब सुदामा और शबरी जैसे भक्तों के घर में निवास करता है।

यह हुआ तो ही धर्म शुद्ध रूप में रहेगा।
तो सभी महान बनने में लगे साधु – लोगों को सत्संग कराते हुए उन्हें सुधारने के बजाय अपनी की हुई गलतियों को जल्दी सुधारे।दूसरे को डुबाने के चक्कर में उसके पहले स्वयं न डूबे। घमंड में न रहें । कल किस ने जाना?  ‘काल ‘ बड़ा बलवान है।
Reference-

लेखन-राजेन्द्र राणे (Date26/08/2017)

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​किसान आन्दोलन-  फायदा किसे होगा ? 

किसान आन्दोलन- फायदा किसे होगा  ? 😢

किसानों की कर्ज माफी  होनी ही चाहिए इस में कोई शक/विरोध नहीं लेकिन सबसे पहले फायदा मिलना चाहिए जरूरतमंदों को,लेकिन दुर्भाग्य है कि जब किसी भी राज्य में किसानों का आन्दोलन चलता है तो विरोध दर्शाने के लिए अथवा दबाव डालकर  तुरंत कर्ज माफ़ कराने के लिए  हजारों लिटर दूध रोड पर बहाया जाता है , सब्जियाँ रोड पर फेंकी  जाती है यह स्वीकार योग्य नहीं है ,लेकिन इस में नुकसान किस का होता है ? ग़रीब किसान तो आंदोलन या संघर्ष के समय १० -२० लिटर दूध का  पनीर/मिठाई का मावा / पेढा /दही या घी बनाता है,वह कभी अपने उत्पाद का नाश नहीं करता क्योंकि वह गरीब होता है .तो रोड पर किस का दूध बहता है ,जिस के घर मैं ५०-१००  गाय या भैस का तबेला हो  ४००-५०० लिटर का उत्पादन हो वह  १० -२० % बहा देते है  है इस नुकसान को लोग  ग़रीब किसानों का आन्दोलन कहते है,कई लोग  रोड पर से गुजरने वाली दूध या सब्जियों की गाडियों को जला देते है कई लोग दूध के टैंकर रोड पर बहा देते है( गाडियों के टायर की हवा निकाल देने से भी रोक सकते है उससे किसीका ज्यादा नुकसान/नाश तो नहीं होगा),लेकिन तीव्र भावना भडकाने के बाद आन्दोलन  जब हिंसक बनता  है तब सरकार द्वारा हडबडी में जो निर्णय/डिसीजन लिए जाते है उस मैं यहीं मुट्ठी भर लोग अपना फायदा उठाते है.वह कैसे ? अनेकों सवाल खड़े होते है, जिन के जबाब है आप के पास ,क्या है सच्चाई ?
१ )देश की लगभग लगभग ८०% खेतीयोग्य जमीन ५% बड़े आमिर जमींदार किसानों के हाथ मैं है .और २०% जमीन ९५ % किसानों के पास है .उसमें भी ६०-७० % से ज्यादा किसानों के पास 1 से 3 एकड़ /बीघा जमीन है .तो सब को एक ही तराजू में कैसे तौल सकते है ?क्या सभी जरूरतमंद है ?सभी को सम्पूर्ण कर्जमाफी क्यों चाहिए  ?
२ )जिन किसानों ने आत्महत्या / खुदखुशियाँ की उनमें ९५ % से ज्यादा  अल्प भू-धारक किसान थे, उनमें से ज्यादातर लोगों का कर्ज १ से ७-८ लाख तक था लेकिन मूल कर्ज सिर्फ  १ से २ लाख और बाकी सारा ६-७ लाख ब्याज था.
3 ) जिन किसानों ने आत्महत्याएं की है उन में से ५०% से ज्यादा किसान गावों में रहनेवाले बाहुबली साहूकारों के अत्याचारों के शिकार हुए है .ऐसे समाज के ५०% किसानों का कुछ भी भला सरकारी  कर्ज माफ़ी से नहीं होनेवाला है. दुर्भाग्य की बात यह है कि हर राज्य में लाखो सरकारी लाइसेन्स धारक साहूकार है और लाखो गैरकानूनी साहूकार.इसी कारण तो जिनका कर्ज माफ़ होनेवाला होता है उस में समाज के  आधे जरूरतमंद आते ही नहीं है जो बैंकिग प्रणाली से कर्जा नहीं लेते .  

४ ) ज्यादातर ग्रामीण बैंकों का हाल देखो तो उस के डायरेक्टर बौडी और उन के रिश्तेदार या चेले चपाटों को या राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को ५०-५० लाख से लेकर करोड़ों  रुपयों का कर्ज दिया जाता है  वहीं पैसों से वह प्रोपर्टी बढाते है या उसी पैसों से साहूकारी का धंदा करते है उसी पैसों से  उन्ही गरीब अल्प भू-धारक किसानों को कर्ज १०% प्रति माह (साल का लगभग  १२०%) देते है पैसा दूगुना एक ही साल में कर लेते  है ,उसी के बोझ में अल्प भू-धारक किसान आत्महत्याएं करते है.आज वहीं बड़े जमींदार संपूर्ण कर्ज माफ़ी की मांग कर रहे है और भोलेभाले अल्प भू-धारक किसान उनके  पीछे खड़े है . तो कर्ज माफ़ी का फायदा किस को होनेवाला है? अरे! इस मांग में सबसे ज्यादा फायदा इन जमींदारों का है भोलेभाले किसान यह समझ नहीं पा रहें इन के एक एक का कर्ज इतना है की उसमें एक  अल्प भू-धारक किसान का कर्ज १०० -१०० बार माफ़ हो सकता है .
५ ) क्या यह कितना जायज है -कि गरीबों के साथ  शोषक साहूकार /जमीदारों का कर्ज माफ़ करते हुए उन के हाथ इतनें   मजबूत करें उनके द्वारा   भविष्य में  हजारों अल्प भू-धारक किसानों का शोषण  होता रहें  . 

६)यदि आप देहात में बचपन बिताए हो तो आपको मालूम होगा छोटे किसान स्वभाव से गरीब डरपोक  होते है और जितना अमीर हो उनके बेटे निडर ,बाहुबली,दबंग स्वभाव के होते है आज जो आगजनी हो रही है ,दंगा  फसाद हो रहा ही उस के पीछे वही शक्तियां काम कर रही है जिन का एक एक का करोड़ों का कर्जा है.संपुर्णप कर्जमाफी का अर्थ यहीं है.सुनने में आया है कई राजनेताओं की 100 से 1000 एकड़ तक खेती है।वह जोर लगा रहे है

७ )अनेक राजनीतिक पार्टियाँ  आन्दोलन में जोर शोर से खड़ी दिती है लेकिन कोई कहता नहीं गरीबों का अल्प भू-धारक किसानों का कर्ज ,माफ़ करो वह तो चतुराई दिखाकर मांग रखते है कि ” सब का सारा कर्ज माफ़ हो.क्योंकि  उन के आमिर  चेले चपाटों का उस में फायदा है” .
यदि किसानों के हितचिन्तक आप हो- या कोई सरकार है -तो कर्जे को माफ़ करने के साथ निम्नलिखित बाते करनी होगी 

१)सभी राज्य सरकारे पैसे की कमी का रोना रोते रहने से ज्यादा गावों में रहनेवाले लोगों के लिए साहूकारों के उपर  नकेल डालने का काम करें  .
२)अनाज की कालाबाजारी करनेवाले गोदामों में जमाखोरी  करनेवालों पर नकेल डाले .
3) जब दाल/शक्कर/प्याज  जेसे अनाज या खेती उत्पाद  की कमीं /शोर्टेज होता है तब ज्यादातर राज्य सरकार के मंत्री ज्यादा कमिशन के लालच में जरूरत से दूगुना विदेशों से आयात करती है मांग में कमी के कारण जिस से दूसरे साल उस पदार्थ के दाम ६० से७० प्रतिशत नीचे आते है .किसान डूबता है उस का जिम्मेदार वह  मंत्री और अफसर होते है.इसी प्रकार किसान दोनों तरफ से पिट जाता है .इस साल महाराष्ट्र में दाल दे रेट कम आए इसी कारण आई है वह शक पैदा करता है.
४)किसान को अकाल या बाढ़ जैसी नैसर्गिक विपदाओं से ज्यादा व्यापारी/ बिचौलियों /दलालों का शिकार हर साल होता है .सरकार कड़े कानून बनाए और पुराने कानूनों का कड़ाई से पालन करें.
५)किसान जिस के लिए कर्ज उठता है वह शादी या दहेज जैसी कुप्रथाओं के कारण, तो उस से बचाने के लिए सामूदायिक विवाह समारोह का आयोजन हर गाँव में किया जाए.इस लिए सरकारें /अनेको सम्प्रदाय /मंदिर/करोडपति संत आगे आए .
६)नदी नालों तालाबों नव-जीवन दिया जाए .वह  करने के लिए किसानों की मदद ली जाए किसानों को उसका मेहनताना दिया जाए.
७) सिर्फ कर्ज माफ़ करने से कुछ नहीं होगा उस के साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा है किसान के हाथ मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालयों की अनेक कल्याणकारी योजनाओं के साथ  गरीब किसानों को जोड़ दो १ लाख की कर्ज माफ़ करने से कुछ नहीं होगा लेकिन ग्रामविकास की अनेक योजना और रोजगार गारंटी की योजनाओं से उन के परिवार से जोड़ दिया तो हर परिवार 3-४ लाख तक कमा सकता है .ठेकेदारों का नहों गाँव के पैसों से गाववालों का विकास होगा. किसानों को ५ साल मैं एक बार मदद देने से अच्छा है उसे स्वावलंबी बनाए . 
८)और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान के सभी उत्पादों पर योग्य न्यूनतम कीमत सरकार तय करे जो व्यापारी उसे तोड़ता है के लिए कड़े कानून बनाए।

९)इस देश का दुर्भाग्य है कि गरीबों के नाम पर लड़ाइयाँ लड़ी जाती है (दूर से )साथ देने का नाटक करते हुए अपने आप को महान इंसान  दिखाने की होड़ चलती है  लेकिन….      फल को तो  बलशाली दबंग पूंजीपति यह किसान होने का मुखौटा ओढ़कर आंदोलन की ही मदद से अपना व्यक्तिगत फायदा उठाने की और गरीबों के मुँह का निवाला छीनने की कोशिश करते है उस षडयन्त्र कोे रोकने की हिम्मत कोई नहीं दिखता।उल्टा डर से हाँ में हां मिलाकर दुम हिलाते है।(यही है भीड़ का मनोविज्ञान) अर्ध सत्य और पूर्ण सत्य दोनो भी सत्य है लेकिन दोनों में जमीन आसमान का अंतर होता है।लेकिन समझने के लिए बुद्धि चाहिए भावनाए नहीं।

१०)यह सारे उपाय ठोस रूप से कोई भी सरकार करती नहीं क्योंकि उनके ‘अर्थ-पूर्ण “संबध  खतरे में पड जाएंगे .

राजेंद्र राणे 

दिनांक 05-06-2017

speechobookhindi@wordpress.com

बाबासाहेब आम्बेडकर और आज का धर्म चिन्तन

बाबासाहब जी व्यक्ति से ज्यादा प्रवृत्ति के विरोधक थे।बाबासाहेब जी को भगवानों से ज्यादा कर्मठ पंडित तथा भगवान के नाम से अपना पेट भरने वाले और अपने मन गढ़ंत गलत नियम बनाने वालों से खतरा लगता था की वह फिर से अज्ञानी जनता को पाखण्ड के नाम पर भगवान के नाम से ग़ुलामी में ना धकेल दें। मुझे व्यक्तिगत यह लगता है सबसे ज्यादा भगवानों का नुकसान किया है तो उनके कुछ स्वार्थी चेलों ने।जो ज्ञान मार्ग और कर्म योग छोड़कर जान बूझकर पाखण्ड और कर्मकांड में लोगों को उलझाते है।आज 60 साल के बाद पढ़े लिखे लोग जो अनपढ़ है उसका ज्ञान सुनने सत्संग में जाते है।अंध श्रद्धा में फंसे है जहां story telling के सिवाय कुछ नहीं होता वह तो साधु है उन्हें विरक्त और साधारण जीवन जीना चाहिए तो जो साधु का वेश धारण किए है उनके 10 हजार करोड़ के आश्रम है।क्यों?।क्योँकि हम आज भी मानसिक गुलाम है।हम स्वयं कोई भी मूल -ज्ञान या ग्रंथ पढ़ना नहीं चाहते ।बाबासाहब ने यह पहचाना था।उन्होंने नफरत नही सिखाई तो जब तक आप काबिल नहीं बनते तब तक दुरी बनाए रखने को कहां। बाबासाहेब सही थे आज भी हम मानसिक गुलाम है ।हम हमें बचाने के लिए कोई अवतार जन्म लेगा इसी आशा में बैठे है।आज कहीं न कहीं तो कमीं है।इसीलिए 60 साल के बाद भी आज दलित समाज बाबासाहेब के बाद उनके जैसे निस्वार्थी और ज्ञानी पढ़े लिखे लोगों को वह लोकनेता नहीं बना सका जो अपने पावर से नहीं विचारों से दुनियां को प्रभावित करता हो ,दुःख इस बात का है बाबासाहेब जैसे हजारो लोग दलित समाज में है लेकिन वह सिर्फ कार्यकर्ता बन सकते है दलित नेता नहीं क्योंकि की समाज आज भी मानसिक गुलाम है।वह सिर्फ चमत्कार या अवतार की राह देख रहा है।समाजसेवी लोगों को सराह नहीं रहा है,यह धार्मिक अंध श्रद्धा का साइड इफेक्ट(मानसिक गुलामी)है।कर्म के मार्ग पर कोई जाना ही नही चाहता।आरक्षण का फायदा जिन्होंने उठाया उनमें एक उच्य वर्ग बन रहा है जो सिर्फ अपने परिवार को लाभ पहुंचाने के बारे में ही सोच रहा है ।जो झोपड़ी में रहनेवाले गरीब से भी गरीब दलित तक लाभ पहुचाना नहीं चाहता ।बाबासाहेब यही वर्ण और वर्ग वादी मानसिकता को बदलना या उच्य-नीचता की सोच को बदलना चाहते थे।नफरत फैलाना नहीं। वह तो सामाजिक अभिसरण चाहते थे।

अनाथों का नाथ फिर भी अनाथ -महात्मा गाँधी

मेरे साथियों !
सब से पहले मै आप का तहे-दिल से
हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।
क्योंकि आप आज……
हिम्मत-जिगर दिखाकर
ऐसे लोकनेता के बारे में
विचार पढने के लिए तैयार हुए,

जिस लोकनेता की अवस्था
इस समाज ने
बेसहारा…,
बेचारा…. ,
असहाय्य…. जैसी की है ।
कट्टरतावादी सामाजिक प्रवाह
मुझे से नाराज होगा…
यह मालूम होते हुए भी,
मै जानबूझ कर….
ऐसे लोकनेता के बारे में
बोलने जा रहा हूँ,

जो आजाद भारत में
सबसे ज्यादा ‘बद-नसीब’…
लोक-नेता रहा।
जिसके पीछे कोई भी
व्यक्ति,नेता,या पार्टी
सच्ची श्रध्दा भावना से
कभी खड़ी नहीं हुई।
उन के नाम पर
गलतफहमिया फैलाई गयी।
हर कोइ उस लोकनेता के नाम
‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ की तरह
इस्तेमाल कर रहा है।
या ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’…. की तरह
उस लोकनेता के नाम को
बरबाद कर रहा है।
जरूरत के हिसाब से
उपयोग में ला रहा है
‘यूज़ एंड थ्रो’…. कर रहा है
उस लोकनेता का फोटो
जिसपर है उस… 500 और
1000 रुपयों नोटों को तो
प्यार से अपनाता है;
लेकिन, व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से…
बड़ी नफरत करता है
ऐसा क्या हुआ ?….
उस लोकनेता ने किया क्या?….
की हम इतनी नफरत करते है ?
उस महामानव ने लोगों को लूटा नहीं….
अपने ‘खानदान को राजनीति’ में
आगे बढ़ाने की कोशिश नही की….
कोई प्रॉपर्टी खड़ी नही की….
देश आजाद होने के बाद
आराम से राष्ट्रपति बन सकते था
लेकिन उस लोकनेता ने राष्ट्रपिता बनाना पसंत किया।
सम्पूर्ण जिंदगी स्वयं व्यक्तिगत रूप से
कोई फायदा नहीं उठाया।
न -अपने सगे बेटे को भी उठाने नही दिया।
क्या, वह… उनकी गलती थी ?
लेकिन वह लोकनेता उस वक्त करोड़ो देशभक्तों के आँखों का तारा था।
आज आजादी के साठ साल के बाद
भारतीय लोगों के अंदर
उस लोकनेता के बारे में
आज जहर… आया कहाँ से ?
इस सब बातों के मूल कारण को…
मै समझता हूं ,मै मानता हूँ।
हम में से स्वयं घोषीत- महाबुद्धिमान
बढ़ते जा रहे है, या
पढ़े लिखे परबुद्धि गवार लोगों का अज्ञान
ज्यादा सुनने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करे .

देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?

*देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?*

आज हम नफ़रत के बारे में माल मसालेदार चर्चा नहीं करेंगे ।समस्या के जड़ तक जाने की कोशिश करेंगे।लगभग ३० साल पहले बचपन में मेरे इतिहास पढाने वाले अध्यापक जी ने एक बात बताई थी “सच्चा अध्यापक वहीं होता है जो संतुलित हो जो सिक्के के दो पहलुओं के साथ समान न्याय कर सके सदा संतुलित रहें।छात्रों को दोनों बाजुओं (पक्षों को )समझाए”।यह नियम सभी विषयों के लिए लागू होता है,लेकिन आज के हमारे समाज का दुर्भाग्य यह है हर बुद्धिवादी अथवा लेखक किसी न किसी विचार धारा से इतना प्रभावित हो गया है की मानो वह सेल्समन बन गया है । उन की आजादी पर मै आज उगली नहीं उठा रहा हूँ क्योंकि उन्हें आजादी का पूरा अधिकार है.मैं उनका पूरा आदर सम्मान करता हूँ। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है की सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी की दिशाहीन करने का काम कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने किया है ।आपने व्यक्तिगत रुचि (like /dislike) को उन्होंने युवकों के उपर थोपा. यह भूल गये की उन्हें सरकार से मिलने वाला लाखो रुपयों का मासिक वेतन अपनी वैयक्तिक विचार धारा को थोपने के लिए नहीं मिलता। किसी विचार धारा का विरोध करने के लिए नहीं मिलता। आप इस देश के अलग अलग विचार धारा के नागरिकों के tax payer के नौकर हो फिर भी उन्होंने उन के साथ गद्दारी की।आज सरकारी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को एक एक कट्टर विचारधारा का अड्डा बना दिया।जो सिर्फ ज्ञान का श्रोत (source )होना चाहिए था ।इन अध्यापकों या प्रोफेसरों का काम न्यायाधीश के भाँती न्याय करना नहीं तो दोनों परस्पर विरोधो विचारों का समझाना था। संतुलित न्याय बुध्दी ही छिन ली इन प्रोफेसरों ने,बाकी बचे अद्यापकों में कई तो भ्रष्टाचार की संतान है ,जो हवा की तरह रुख बदल कर जान बचाते हैं।ऐसा संशोधन करते है जिन किताबों की 25 या 50 प्रिंट निकलती है ।जो उनके अपने घर में ही दिखती है। साल में 10-12 लाखऔर 10 साल में लगभग 1 करोड़ वेतन वालों पेटू लोगों का बॉयोडाटा देखो 10-15 सालों में सिर्फ 4-5 लेख छपवाए होंगे।कुँए में नहीं है तो बाल्दी में कहाँ से आएगा?परिणाम स्वरूप साक्षरों(युवकों का) अज्ञान -निरक्षरों तक पहुँचा आज भारत के ९०% लोगों में जो नफऱतका भाव है।मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।उस का कारण उनका इकतरफा विकास है।लोग समझतें है कि मेरी विचारधारा का विकास तब ही हो सकता है जब मै सामनेवाली विचारधारा से नफरत करूंगा। आज की TV या प्रिंट मिडिया का भी संतुलन बिगड़ गया है वह अपने आप को न्यायाधीश समजने लगें है.।कमजोर इन्सान की तरह सिर्फ एकतरफा बाते करते है.अरे !सुंदर फूलों की माला तभी बन सकती है जब उसमें सभीं रंगों के फुल हो।इसी प्रकार का सरल जीवन होता है.उसे हमने जटिल बनाया है।इतिहास में एक नेता सामाजिक न्याय के लड़ रहा था ,तो दूसरा राजनीतिक न्याय के लिए, तीसरा संस्कृति की रक्षा के लिए।वह सारे लोग/नेता हमें -हर एक को अपनी जगह पर सही दिखाई देंगे जब हम दूसरे रंग के/ या अपने व्यक्तिगत चश्में से नहों देखेंगे।सही ज्ञानी उसी को कहते है जो संतुलित विचार रखता हो।जब यह होगा तब ही समाज समस्या रहित होगा।
-लेखन राजेन्द्र राणे (speechobook@WordPress.com)

एक खत करण जौहर के नाम।(ऐ दिल है मुश्किल)

एक खत -करण जौहर के नाम।
(ऐ दिल है मुश्किल)
महोदय,’.ऐ दिल है मुश्किल’ के ऊपर चलने वाली tv चर्चा ने दिमाग में दर्द डाल कर मुश्किल कर दिया है।
1) करण जौहर ने क्या भूल गए की 2013 में भारतीय सोल्जर का सिर पाकिस्तानियों ने काटे थे। बम्बई में आतंकवादी हमले की यादें भी साथ है।जहाँ सैकड़ो आम आदमी के साथ वफादार पुलिसवाले शहीद हुए थे।वह वहीं पुलिसवाले है जो 24 घण्टे आप जैसे सेलेब्रेटी की सुरक्षा करते है।फिर वह 2014-15 में पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर फिल्म कैसे बना सकते है।कैसे कह सकते है कि उस वक्त हालात अच्छे थे।जिन्हें याद नहीं उनके लिए फोटो भी डाला है।उन परिवार वालों को शहीदों के कटे हुए सिर जो अभीतक नहीं मिले है।जापान में 80 साल पहले अमरीका ने परमाणु बम फेका था उसके विरोध में आज तक जापान के मार्केट में अमरीकन चीजे होती है लेकिन एक भी चीज कोई खरीदता नहीं ।उस से हम कुछ सीखने वाले नहीं?

2) यदि कोई कला का विरोध है यह मानते है बड़े बड़े भाषण देते है वह कभी न कभी तथाकथित पुरोगामी बनकर आरक्षण का समर्थन भी करते दिखते हैं तो अपने देशवासी कलाकारों के लिए आरक्षण क्यों नहीं मांग रहे? मै एक उदाहरण देना चाहूंगा।जब करन जौहर पाकिस्तानी टेलेंट की बात करता है तो उसी वक्त वह 125 करोड़ भारत वासियों का अपमान करता है।हमारे नौजवान कुछ कम है क्या?मराठी भाषा में सैराट नाम की फिल्म बनी जिस में सारे कलाकार गरीब घर के (पिछड़ों में से भी थे )सामान्य चेहरों के जिन्होंने कभी जिंदगी में अभिनय नहीं किया था।फिर भी फिल्म 100 करोड़ कमा पाई। आप ने इस फिल्म झिग झिं झिंगाट यह गाना सुना होगा।तो 50-60 करोड़ वाली फिल्म के लिए ड्रामा क्यों।हंगामा क्यों?

3) पाकिस्तान छोड़कर किसी देश के खिलाफ जनमत नहीं है।कैटरीना कैफ जैसी यूरोपियन मुस्लिम ,जैकलीन जैसी श्रीलंका की अभिनेत्री को,विदेशी मूल की अनेक अभिनेत्रियों को स्वीकारता है। यूरोपियन अमरीकन डायरेक्टर को स्वीकारता है।विदेशी क्रिकेट कोच स्वीकारता है।वहां कोई विरोध भी है क्या? लेकिन जो देश तो कई हिंदुस्थानी कलाकारों को पाकिस्तान का प्रेम क्यों उमड़ आता है।देशवासियों पर आरोप करना बंद करो।

4)बचाव के लिए जो बुद्धिमान (बेचे गये) आते है वह कहते है की सीमा पर व्यापार चालू है बस ट्रेन चालू है, तो कलाकारों पर आक्रमण क्यों ?व्यापार से समाज के ऊपर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता कोई इमोशन जुड़ा नहीं होता ।लेकिन जिस भारत देश के पढेलिखे गवाँर लोग फ़िल्मी अभिनेता को भगवान जैसा पूजते हैं मंदिर भी बनाते है।बालों से लेकर कपड़ों तक सब अंधा अनुकरण वहाँ मूर्खों के सामने नया विदेशी आदर्श (????)क्यों रख रहे हो ?

5)जो भारतीय पाकिस्तान के कलाकारों को इसी लिए लेते है क्योंक़ि पाकिस्तान में उनका बिजनेस चले।पैसे मिले। ऐसा सुना है कि पाकिस्तान से करोड़ों की कमाई होती है। वह सीधे मार्ग से भारत लाते हैं तो मुझे कोई आक्षेप नहीं उल्टा अच्छा है ।
(लेकिन इन बड़बोलों से अक्षयकुमार जैसे सब से ज़्यादा 20 -30 करोड़ो रूपयों का एडवान्स टेक्स देने के आंकड़े नहीं सुने।उल्टा यह सुना है की इनके कई दोस्त तथा पुराने फिल्मों के हिरों पर टेक्स चोरी के मामले में पूछताछ चल रहीं है।)

6) देशभक्ति की बाते करते है लेकिन नाना पाटेकर ,मकरंद जैसे कलाकार अकालग्रस्त के लिए करोड़ो रूपये दान दे रहे थे तब यह बाकी बड़बोले कहाँ थे।

7) हर गलती का आदमी का हर आदमी प्रायश्चित्त लेता है ,लेकिन करन जौहर ने सैनिकों के परिवारों को मुनाफे का कोई हिस्सा देने की कोई बात भी नहीं की।तो उसकी लड़ाई फायदा कमाने की है।वह देशभक्ति की बात क्यों कर रहा है?सुना है 5 करोड़ आर्मी वेलफेयरफंड को देने की बात चल रही है। प्रॉफिट का 5% ,भी नहीं अर्थात 500 करोड़ का बिजनेस करेंगे 1% सैनिकों को देंगे।अच्छा है उल्लू बनाने का धंदा।और सभी विरोध करनेवाले मान भी गए??????? क्यो?tv news में सुनकर
यह अच्छा लगा की देशभक्त पूर्व सैनिकों ने जबरदस्ती का डोनेशन लेने से मना किया है।वह विचारों पर अडिग है।

8) ‘बजंरगी भाईजान’ जैसी फिल्म रीयल रिश्ते सुधारने की अच्छि कोशिश थी उसमें तो पाक कलाकारों की जरूरत थी फिर भी सारे प्रमुख कलाकार भारतीय थे।फिर भी फिल्म भी रियल लगी।

9)इस फिल्म में ऐसी कोई जरूरत नहीं फिर करन जौहर को को सिर्फ पाकिस्तान से होनेवाला ज्यादा प्रॉफिट का लालच दिखता है।करण जौहर वह कोई सामाजिक फिल्मे नहीं बनाता रोमेंटिक फिल्मे बनाता है। वह भी सुन्दर सुन्दर चेहरे की अमीरों के सुंदरता के दर्शन(सपने) करोड़ो गरीबों को बेचने वाला।उनसे पैसे कमानेवाला।उसने आज तक गरीबी के या गरीबों के दर्द पर कोई फिल्म नहीं बनाई।

10)एक नई कहावत है भैस कितना भी ज्यादा दूध देती हो उसे गोद में लेकर बैठोगे तो गोबर की बदबू सहनी पड़ेगेही। जान बूझकर गलती करनेवालों को क्या कहें ?.(इतनी जोर जोर से आतंकवाद पर भी बोला करो ।)

11)बिजनेस वीजा पर पर जो भारत में आते है।उनसे तो देश का फायदा होता है।लेकिन जो टूरिस्ट वीजा पर बुलाकर फिल्मे बनाते है वह देश का नुकसान करने वाले होते है।तो उनके लिए इतनी चर्चा क्यों ?

12)इन विचारों का विरोध करने वाली राजनितिक पार्टियों से कोई सम्बद्ध नहीं।
फिल्म देखना या न देखना पूर्णता आप का डिसिजन होगा।मेरा वह काम नहीं।मेरा काम सिर्फ देश की तरफ से कुछ विचार ऱखना।समीक्षा करना है।हो सकता है कुछ मेरे विचार गलत भी हो।
धन्यवाद।
एक परेशान आम आदमी।
(RAJENDRA RANE-).
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तेजोसूर्य -डा. बाबासाहेब आंबेडकर

जब जातीय उच्च-नीचता

एवं विषमता के जहर ने समाज का अन्तरंग

दूषित एवं कलुषित कर डाला था,

एक ही देश में रहकर लोग

एक दूसरे का तिरस्कार करने लगे थे,

देश की सामाजिक एकता

जातियों के हज़ारों टुकड़ों में

खण्ड विखंडित होकर बिखर गई थी,

तब परिणाम स्वरूप भारत

विदेशियों के आक्रमणों में

एक हजार सालों से

लगातार हारता गया।

क्योंकि अखण्ड भारत को

जाति भेद के जहर ने

नाकाम और नपुंसक बना दिया था,

बड़े दुर्भाग्य की

और मूर्खतापूर्ण बात यह है कि

हिन्दुओं ने विदेशी विजातिय बादशाहों की

राजनीतिक गुलामी मंज़ूर की,

लाचार बनकर उनके चरणों में

1000 साल तक पड़े रहें,

लगातार १५० साल तक अंग्रजों के तलुए चाटते रहे

लेकिन उच्चवर्गीय होने का ‘दंभ’

कभी भी नहीं छोड़ा।

अपने ही धर्म के लोगों को,

दीन-दलित आदिवासियों को,

बराबरी का स्थान नहीं दिया।

शूद्र कहते हुए

धार्मिक गुलामी की श्रृंखला में

उन्हें बाँधकर रखा।

अस्पृश्यता या छुआ-छूत की

इस प्रथा के कारण

 ‘इन्सान ने’

‘इन्सान को’

‘इन्सान समझना’ ही छोड़ दिया था।

हिन्दू धर्म की पवित्र विचार धारा को

चातुर्वर्ण्यं व्यवस्था ने कलंकित कर डाला।

देश और धर्म की एकता को

 खंड-विखन्डित कर दिया।

कर्म आधारित अर्थात

श्रम अधिष्ठित समाज व्यवस्था को

मुट्ठी भर स्वार्थी लोगों ने

जन्म आधारित चातुर्वर्ण्य धर्म बना डाला।

तथाकथित कर्मकांड एवं आडम्बरों को

धर्म का जामा पहनाकर

जाति, पंथ, संप्रदाय का खेल शुरू किया।

‘तोड़ो और राज करो’ की नीति

विश्व बन्धुता को

 जिन्दा गाड़कर अपनाई गई।

धर्म का मर्म न समझने वाले

 धार्मिक हो गए।

५०००से ज्यादा जाति उपजाति के टुकड़ों में

इस समाज को बिखेर दिया गया।

अन्न,वस्त्र, निवास, शिक्षा,आरोग्य

तो छोड़ ही दो,

पीने के पानी पर भी

दलितों का अधिकार नही था।

बड़े महलों, तटबंदियाँ,पुल,कुएँ

आदि की नींव में

जिंदा गाडकर उनकी बलि चढाई जाती थी।

ऐसे वक्त एक तेजोसूर्य का जन्म हुआ।

जिसने हजारों सालों की

 गुलामी में जो सड़ रहें थे,

उन दलितों को

गुलामी की श्रृंखला से

मुक्त करने का जिम्मा उठाया।

उनका नाम था-

‘भीमराव रामजी आंबेडकर ‘।

जिसे हजारो शोषितों ने  

प्यार से अपना नाम दिया

‘बाबासाहेब आंबेडकर ‘।

– राजेंद्र राणे.
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Ref –
Dr. Babasaheb Ambedkar,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )

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