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किसी भी जाति-धर्म / राजनितिक पार्टी इससे किसी भी तरह का संबध नहीं .
coming soon …….-
1) बाबासाहब आम्बेडकर   2) महात्मा गाँधी    3) भगतसिह   ४) वीर सावरकर   ५) गौतम बुद्ध  ६) कबीरदास,मीराबाई और तुलसीदास      ७)र्रैदास ,रहीम     8)बिहारी    9)बादशाह अकबर और अशोक

इन में से ज्यादा तर speechobook पूर्णता की और है ,जब  youtube channel में आवश्यक संख्यामें subscription हो जाएगे तब वह प्रकाशित होगे ।

मेरे विचार जैसे के वैसे स्वीकारो यह मेरा आग्रह नहीं।जो आप के बुद्धि के कसोटी पर खरे उतरते है सिर्फ उन्हें तो स्वीकार सकते हो ।जरूरी यह नही कौन बोल रहा है जरूरी यह है की क्या बोल रहा है ।एक लेखक या व्याख्याता के रुप में नहीं एक साधारण अध्यापक के रुप में मैने विचारों का प्रस्तुत किया है।

आप आगे आनेवाले सभी speechobook के लिए सुझाव दिए गए link पर भेज सकते हो।
स्वागत है।
चलो शुरुवात करें। ……..
अखण्ड भारत के नव निर्माण के लिए ।

जब स्कूल (or College) में बच्चों को पढाता था,जब भारत के सभी महापुरुषों के बारे में बताता था, तब मुझे महसूस हुआ की बच्चें भी ‘महापुरुष’ या ‘भारतीय संस्कृति के सभी त्योहारों’ का जाति,प्रान्त,भाषा,या राजनीतिक आधार पर वर्गीकरण करते हुए अलग अलग चश्में से उन्हें देखते है।उन्हें स्वीकारने में आनाकानी करते है।
भारतीय जनमानस में वैचारिक अछूता का तेजी से प्रसार हो रहा है। म.गांधीजी,से लेकर बाबासाहब आंबेडकर तक, महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी तक, वीर सावरकर से लेकर महात्मा फुले तक, स्वामी विवेकानंद से लेकर मदर तेरेसा तक,खान अब्दूल गफारखान (सरहद्द गांधी)आदि तक सब के बारे में (आदर या प्रेम करने का अधिकार के बारे में) संकुचितता प्रन्तियता,या जातियता की नजर से देखते है,यह दुर्भाग्य की बात है।
‘राजहंस पक्षी’ के बारे में एक सुभाषित है कि उसके सामने किसीने पानी में दूध मिलाकर रखा तो वह विवेक बुद्धि से पानी और दूध को अलग करते हुए जो उचित है वह पीता है,क्या हम इन्सान उसके मार्ग का अनुसरण करते हुए उन सभी सैकडों महापुरुषों के ‘जो विचार’ अच्छे नही लगते सिर्फ उन्ही को छोडकर बाकी विचारों को सराहने की कोशिश नहीं करेगें? मान्य है महापुरुष को १००% स्वीकार नहीं सकते कम से कम ५०% या ७५% तो स्वीकार सकते है । लेकिन सम्पूर्णता उन्हें अस्वीकारना करना (- १००%)विरोध करना हमारी मुर्खता का एवं बौद्धिक कमजोरी का परिचायक है।
राजनीतिक पार्टियों की मजबूरी को मै स्वीकार लेता हूँ ।लेकिन आजाद देश के आजाद इन्सान के नाते परप्रकाशित ,एव परजीवी होने से अच्छा है ,आप ‘स्वयं प्रकाशित’ हो ।सामाजिक नहीं तो कम से कम व्यक्तिगत तौर पर मेरे विचार स्वीकारो यह मेरा आग्रह नहीं। जो आप के बुद्धि के कसोटी पर खरे उतरते है उन्हें तो स्वीकार सकते हो ।
जरूरी यह नही कौन बोल रहा है जरूरी यह है की क्या बोल रहा है ।एक लेखक या व्याख्याता के रुप में नहीं एक साधारण अध्यापक के रुप में मैने विचारों का प्रस्तुत किया है ।
आप आगे आनेवाले सभी speechobook के लिए सुझाव दिए गए link पर भेज सकते हो।
स्वागत है।
चलो शुरुवात करें। ……..
अखण्ड भारत के नव निर्माण के लिए…………………………………….

 

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