बाबा राम रहीम जैसे साधुओं को कौन बनाता है  शैतान ? 

बाबा राम रहीम जैसे साधुओं को कौन बनाता है  शैतान ?….. जिस के पास 10 हजार करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टी है 1 करोड़ से ज्यादा भक्त  हो,  गुंडों को फ़ौज हो,  नेता औऱ पुलिस  जिसके  चरण स्पर्श करते चरणों में बैठे हो फिर भी कुछ काम नहीं आया क्योंकि अहंकार  से उसने अधर्म का मार्ग चुना एक गरीब  शोषित निराधार लड़की के दर्द (श्राप * १५ साल पहले  प्रधानमंत्री को लिखे हुए एक पत्र ने) ने बाबा राम रहीम (हरियाणा डेरा सच्चा सौदा ) को जेल पहुँचा दिया । एक बड़े बूढ़े  साधु  के बाद यह दूसरी घटना। साधुओं के बारे में यह ज्यादा इसी लिए हो रहा है क्योंकि बिना मेहनत से किसी पुराने  अच्छे और सच्चे सम्प्रदाय के नाम पर  उसका प्रमुख बनते ही आसानी से मिलनेवाली सत्ताऔर  संपत्ति के नशे में वह अहंकारी घमंडी बनकर दूसरों का आर्थिक, मानसिक, शारीरिक शोषण करते है। लेकिन एक सच्चा प्रामाणिक- घास के टुकड़े जैसा, छोटा- सा गरीब आदमी /औरत सामने खड़ा होता/होती है तब इन की लंका  का दहन होता है।
इन कांडों में लिप्त तथाकथित साधुओं के सभी सम्प्रदाय के विचारों को उदाहरण के तौर उन्हें- ही बताना चाहूंगा कि उन बड़े शोषक लोगों को भगवान भी साथ नही देता क्योंकि उन पापी की स्वयं की अंतरात्मा को सत्य मालूम होता है वह कभी  बुराई षडयन्त्र का साथ नहीं देती  सिर्फ वही भगवान से संपर्क का सही- एकमात्र साधन है ,उस से ही भगवान को संदेश पहुंचता  है।  इन तथाकथित साधु संतों के शिकार सिर्फ भोले ,सज्जन, और धार्मिक लोग होते है जो उन बड़े  शोषक लोगों से भी पुण्यवान होते है उनका दर्द कहो,बद्दुआ कहो या श्राप वह जरूर जल्दी नुकसान कराता है।  क्योंकि उनका विरोध एक सच्चा इंसान कर रहा होता है।गीता में भी कहा है कि हजारों अधर्मी लोगो की हत्या का कर्म (पाप)आत्मा को नहीं चिपकता लेकिन एक सतमार्गी को मन से , वाणी से अथवा तन को भी दिया हुआ दर्द हमारी आत्मा को मलिन कर देता है।( हमें नष्ट कर कर देता है।)  मैंने जितने मूल धर्म ग्रन्थ पढ़े है उसके धर्म चिंतन के अनुसार मैने महसूस किया है कि हमारी नियत -नियति का निर्माण करती है।………नियति परिवर्तन लाती है।……..हर परिवर्तन संकल्प के अनुसार फल निर्माण करता है।……हर फल संकल्प की पवित्रता के अनुसार परिणाम देता ही है।.. …. जब कालचक्र शुरू जब होता है  परिवर्तन  की आहट देता है। अस्थिरता ,चंचलता का दौर शुरू होता है……. जो इसे समझता है।वही ज्ञानी … गलतियों को सुधारकर .. सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर।इस में से  बच  जाता है । इन सारी  घटित घटनाओं से बहुत सारे अनीति के मार्ग पर अभी भी चलने वाले कुछ  सीख ले।15 साल हो या 20 साल भगवान के घर देर है अंधेर नही।वह दिन जब आएगा तब पछतावा करने से कुछ नही होगा।यह …..मैं नही …उनके सम्प्रदायों  के महान ग्रंथ बता रहे है। 
एक सफल सर्वमान्य डॉक्टर , इजीनियर, या प्रोफेसर बनने के  लिए 40 उम्र कट जाती है लेकिन साधु बनकर 100 -500 साल पुराने एक बड़े सम्प्रदाय का प्रमुख 10 या 20 साल के  कच्चे उम्र में आसानी से बना जा सकता है इसी कारण अपरिपक्व,कच्चे और अज्ञानी के  हातों अपार पावर आती है तो उस से  गलतियां होगी ही उसमे उसकी नहीं गंवार अंध भक्तों की गलती है।जो योगी को भोगी बनने की लत लगाते है। भारत की प्राचीन ऋषि परम्परा में नही होता था पहले ज्ञान,तप, के बाद  परिपक्व अनुभवी बनने के बाद उम्र के 50-60  साल के बाद  आश्रम या सम्प्रदाय प्रमुख का पद मिलता था।लेकिन आज वृद्ध,पुराने अनुभवी  साधुओं को कोई नही पूछता और संख्या बल से गलत लोग  आश्रमों के प्रमुख बन रहे है।

यह सर्वकालीन सत्य है कि जो विरक्त होता है वहीं साधु होता है लेकिन जहां धन -सम्पत्ति -सत्ता का सम्पर्क होगा वहां शैतानी साये (घमण्ड, अहंकार, क्रोध,मोह, माया,मत्सर) का करंट लगेगा ही ।उनकी भी कोई गलती नही अरे गलती हमारी है जो  गुरु को गुरु (Teacher साधन/माध्यम) नहीं -इन तथाकथित गुरुओं को उनके चेले चपाटे जो परप्रकाशीत ,अंध भक्त  है वह भगवान बनाने में लगे हुए है। इस देश के 10 हजार साल के इतिहास में लाखों ऋषि ,संत हुए लेकिन किसी ने आपने आप को जीते जी भगवान घोषित नहीं किया।वह भक्त बने रहे।उनके स्वर्गवास के बाद लोगो ने  भगवान माना यह अलग बात है।लेकिन आज 50 -60 सालों में  स्वयं घोषित भगवान की बाढ़ सी आ गई है । हम अन्धश्रद्धा लिप्त जनता लालच में आ-कर स्वर्ग का टिकट खरीदने अथवा अपना पाप छुपाने अमर्याद रूप से उन्हें दान  देती है तब उस की  ही नशा से वह बिगड़ जाते है जिम्मेदार हम है धर्म मार्ग को चलनेवालों को अधर्मी बनाने के लिए। 

भारतीय संस्कृति की अनुसार उन्हें विरक्त,परीत्यागी, संन्यासी रहना  ही है  जो मार्ग उन्होंने स्वयं चुना है अपनी अकल चलाकर उन्हें राजभोगी अमर्याद सत्ता से उन्मत्त मत बनाओ।प्रकृति का नियम है हर एक्शन की रिएक्शन होती  है।वह उनपर भी लागू है,  जो बिना जरूरत दोगे तो विकार जगेंगे ही।यदि आप को दान देना ही है तो जरूरतमंदों को,गरीबों को दो,समाजसेवी संस्थाओं को दो।भगवान मंदिरों से ज्यादा गरीब सुदामा और शबरी जैसे भक्तों के घर में निवास करता है।

यह हुआ तो ही धर्म शुद्ध रूप में रहेगा।
तो सभी महान बनने में लगे साधु – लोगों को सत्संग कराते हुए उन्हें सुधारने के बजाय अपनी की हुई गलतियों को जल्दी सुधारे।दूसरे को डुबाने के चक्कर में उसके पहले स्वयं न डूबे। घमंड में न रहें । कल किस ने जाना?  ‘काल ‘ बड़ा बलवान है।
Reference-

लेखन-राजेन्द्र राणे (Date26/08/2017)

speechobookhindi.wordpress.com

Advertisements