​किसान आन्दोलन-  फ़ायदा किस का  ? 

किसान आन्दोलन- फायदा किसे होगा  ? 😢

किसानों की कर्ज माफी  होनी ही चाहिए इस में कोई शक/विरोध नहीं लेकिन सबसे पहले फायदा मिलना चाहिए जरूरतमंदों को,लेकिन दुर्भाग्य है कि जब किसी भी राज्य में किसानों का आन्दोलन चलता है तो विरोध दर्शाने के लिए अथवा दबाव डालकर  तुरंत कर्ज माफ़ कराने के लिए  हजारों लिटर दूध रोड पर बहाया जाता है , सब्जियाँ रोड पर फेंकी  जाती है यह स्वीकार योग्य नहीं है ,लेकिन इस में नुकसान किस का होता है ? ग़रीब किसान तो आंदोलन या संघर्ष के समय १० -२० लिटर दूध का  पनीर/मिठाई का मावा / पेढा /दही या घी बनाता है,वह कभी अपने उत्पाद का नाश नहीं करता क्योंकि वह गरीब होता है .तो रोड पर किस का दूध बहता है ,जिस के घर मैं ५०-१००  गाय या भैस का तबेला हो  ४००-५०० लिटर का उत्पादन हो वह  १० -२० % बहा देते है  है इस नुकसान को लोग  ग़रीब किसानों का आन्दोलन कहते है,कई लोग  रोड पर से गुजरने वाली दूध या सब्जियों की गाडियों को जला देते है कई लोग दूध के टैंकर रोड पर बहा देते है( गाडियों के टायर की हवा निकाल देने से भी रोक सकते है उससे किसीका ज्यादा नुकसान/नाश तो नहीं होगा),लेकिन तीव्र भावना भडकाने के बाद आन्दोलन  जब हिंसक बनता  है तब सरकार द्वारा हडबडी में जो निर्णय/डिसीजन लिए जाते है उस मैं यहीं मुट्ठी भर लोग अपना फायदा उठाते है.वह कैसे ? अनेकों सवाल खड़े होते है, जिन के जबाब है आप के पास ,क्या है सच्चाई ?
१ )देश की लगभग लगभग ८०% खेतीयोग्य जमीन ५% बड़े आमिर जमींदार किसानों के हाथ मैं है .और २०% जमीन ९५ % किसानों के पास है .उसमें भी ६०-७० % से ज्यादा किसानों के पास 1 से 3 एकड़ /बीघा जमीन है .तो सब को एक ही तराजू में कैसे तौल सकते है ?क्या सभी जरूरतमंद है ?सभी को सम्पूर्ण कर्जमाफी क्यों चाहिए  ?
२ )जिन किसानों ने आत्महत्या / खुदखुशियाँ की उनमें ९५ % से ज्यादा  अल्प भू-धारक किसान थे, उनमें से ज्यादातर लोगों का कर्ज १ से ७-८ लाख तक था लेकिन मूल कर्ज सिर्फ  १ से २ लाख और बाकी सारा ६-७ लाख ब्याज था.
3 ) जिन किसानों ने आत्महत्याएं की है उन में से ५०% से ज्यादा किसान गावों में रहनेवाले बाहुबली साहूकारों के अत्याचारों के शिकार हुए है .ऐसे समाज के ५०% किसानों का कुछ भी भला सरकारी  कर्ज माफ़ी से नहीं होनेवाला है. दुर्भाग्य की बात यह है कि हर राज्य में लाखो सरकारी लाइसेन्स धारक साहूकार है और लाखो गैरकानूनी साहूकार.इसी कारण तो जिनका कर्ज माफ़ होनेवाला होता है उस में समाज के  आधे जरूरतमंद आते ही नहीं है जो बैंकिग प्रणाली से कर्जा नहीं लेते .  

४ ) ज्यादातर ग्रामीण बैंकों का हाल देखो तो उस के डायरेक्टर बौडी और उन के रिश्तेदार या चेले चपाटों को या राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को ५०-५० लाख से लेकर करोड़ों  रुपयों का कर्ज दिया जाता है  वहीं पैसों से वह प्रोपर्टी बढाते है या उसी पैसों से साहूकारी का धंदा करते है उसी पैसों से  उन्ही गरीब अल्प भू-धारक किसानों को कर्ज १०% प्रति माह (साल का लगभग  १२०%) देते है पैसा दूगुना एक ही साल में कर लेते  है ,उसी के बोझ में अल्प भू-धारक किसान आत्महत्याएं करते है.आज वहीं बड़े जमींदार संपूर्ण कर्ज माफ़ी की मांग कर रहे है और भोलेभाले अल्प भू-धारक किसान उनके  पीछे खड़े है . तो कर्ज माफ़ी का फायदा किस को होनेवाला है? अरे! इस मांग में सबसे ज्यादा फायदा इन जमींदारों का है भोलेभाले किसान यह समझ नहीं पा रहें इन के एक एक का कर्ज इतना है की उसमें एक  अल्प भू-धारक किसान का कर्ज १०० -१०० बार माफ़ हो सकता है .
५ ) क्या यह कितना जायज है -कि गरीबों के साथ  शोषक साहूकार /जमीदारों का कर्ज माफ़ करते हुए उन के हाथ इतनें   मजबूत करें उनके द्वारा   भविष्य में  हजारों अल्प भू-धारक किसानों का शोषण  होता रहें  . 

६)यदि आप देहात में बचपन बिताए हो तो आपको मालूम होगा छोटे किसान स्वभाव से गरीब डरपोक  होते है और जितना अमीर हो उनके बेटे निडर ,बाहुबली,दबंग स्वभाव के होते है आज जो आगजनी हो रही है ,दंगा  फसाद हो रहा ही उस के पीछे वही शक्तियां काम कर रही है जिन का एक एक का करोड़ों का कर्जा है.संपुर्णप कर्जमाफी का अर्थ यहीं है.सुनने में आया है कई राजनेताओं की 100 से 1000 एकड़ तक खेती है।वह जोर लगा रहे है

७ )अनेक राजनीतिक पार्टियाँ  आन्दोलन में जोर शोर से खड़ी दिती है लेकिन कोई कहता नहीं गरीबों का अल्प भू-धारक किसानों का कर्ज ,माफ़ करो वह तो चतुराई दिखाकर मांग रखते है कि ” सब का सारा कर्ज माफ़ हो.क्योंकि  उन के आमिर  चेले चपाटों का उस में फायदा है” .
यदि किसानों के हितचिन्तक आप हो- या कोई सरकार है -तो कर्जे को माफ़ करने के साथ निम्नलिखित बाते करनी होगी 

१)सभी राज्य सरकारे पैसे की कमी का रोना रोते रहने से ज्यादा गावों में रहनेवाले लोगों के लिए साहूकारों के उपर  नकेल डालने का काम करें  .
२)अनाज की कालाबाजारी करनेवाले गोदामों में जमाखोरी  करनेवालों पर नकेल डाले .
3) जब दाल/शक्कर/प्याज  जेसे अनाज या खेती उत्पाद  की कमीं /शोर्टेज होता है तब ज्यादातर राज्य सरकार के मंत्री ज्यादा कमिशन के लालच में जरूरत से दूगुना विदेशों से आयात करती है मांग में कमी के कारण जिस से दूसरे साल उस पदार्थ के दाम ६० से७० प्रतिशत नीचे आते है .किसान डूबता है उस का जिम्मेदार वह  मंत्री और अफसर होते है.इसी प्रकार किसान दोनों तरफ से पिट जाता है .इस साल महाराष्ट्र में दाल दे रेट कम आए इसी कारण आई है वह शक पैदा करता है.
४)किसान को अकाल या बाढ़ जैसी नैसर्गिक विपदाओं से ज्यादा व्यापारी/ बिचौलियों /दलालों का शिकार हर साल होता है .सरकार कड़े कानून बनाए और पुराने कानूनों का कड़ाई से पालन करें.
५)किसान जिस के लिए कर्ज उठता है वह शादी या दहेज जैसी कुप्रथाओं के कारण, तो उस से बचाने के लिए सामूदायिक विवाह समारोह का आयोजन हर गाँव में किया जाए.इस लिए सरकारें /अनेको सम्प्रदाय /मंदिर/करोडपति संत आगे आए .
६)नदी नालों तालाबों नव-जीवन दिया जाए .वह  करने के लिए किसानों की मदद ली जाए किसानों को उसका मेहनताना दिया जाए.
७) सिर्फ कर्ज माफ़ करने से कुछ नहीं होगा उस के साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा है किसान के हाथ मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालयों की अनेक कल्याणकारी योजनाओं के साथ  गरीब किसानों को जोड़ दो १ लाख की कर्ज माफ़ करने से कुछ नहीं होगा लेकिन ग्रामविकास की अनेक योजना और रोजगार गारंटी की योजनाओं से उन के परिवार से जोड़ दिया तो हर परिवार 3-४ लाख तक कमा सकता है .ठेकेदारों का नहों गाँव के पैसों से गाववालों का विकास होगा. किसानों को ५ साल मैं एक बार मदद देने से अच्छा है उसे स्वावलंबी बनाए . 
८)और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान के सभी उत्पादों पर योग्य न्यूनतम कीमत सरकार तय करे जो व्यापारी उसे तोड़ता है के लिए कड़े कानून बनाए।

९)इस देश का दुर्भाग्य है कि गरीबों के नाम पर लड़ाइयाँ लड़ी जाती है (दूर से )साथ देने का नाटक करते हुए अपने आप को महान इंसान  दिखाने की होड़ चलती है  लेकिन….      फल को तो  बलशाली दबंग पूंजीपति यह किसान होने का मुखौटा ओढ़कर आंदोलन की ही मदद से अपना व्यक्तिगत फायदा उठाने की और गरीबों के मुँह का निवाला छीनने की कोशिश करते है उस षडयन्त्र कोे रोकने की हिम्मत कोई नहीं दिखता।उल्टा डर से हाँ में हां मिलाकर दुम हिलाते है।(यही है भीड़ का मनोविज्ञान) अर्ध सत्य और पूर्ण सत्य दोनो भी सत्य है लेकिन दोनों में जमीन आसमान का अंतर होता है।लेकिन समझने के लिए बुद्धि चाहिए भावनाए नहीं।

१०)यह सारे उपाय ठोस रूप से कोई भी सरकार करती नहीं क्योंकि उनके ‘अर्थ-पूर्ण “संबध  खतरे में पड जाएंगे .

राजेंद्र राणे 

दिनांक 05-06-2017

speechobookhindi@wordpress.com

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