Dr. Babasaheb Ambedkar

बाबासाहेब आम्बेडकर और आज का धर्म चिन्तन

बाबासाहब जी व्यक्ति से ज्यादा प्रवृत्ति के विरोधक थे।बाबासाहेब जी को भगवानों से ज्यादा कर्मठ पंडित तथा भगवान के नाम से अपना पेट भरने वाले और अपने मन गढ़ंत गलत नियम बनाने वालों से खतरा लगता था की वह फिर से अज्ञानी जनता को पाखण्ड के नाम पर भगवान के नाम से ग़ुलामी में ना धकेल दें। मुझे व्यक्तिगत यह लगता है सबसे ज्यादा भगवानों का नुकसान किया है तो उनके कुछ स्वार्थी चेलों ने।जो ज्ञान मार्ग और कर्म योग छोड़कर जान बूझकर पाखण्ड और कर्मकांड में लोगों को उलझाते है।आज 60 साल के बाद पढ़े लिखे लोग जो अनपढ़ है उसका ज्ञान सुनने सत्संग में जाते है।अंध श्रद्धा में फंसे है जहां story telling के सिवाय कुछ नहीं होता वह तो साधु है उन्हें विरक्त और साधारण जीवन जीना चाहिए तो जो साधु का वेश धारण किए है उनके 10 हजार करोड़ के आश्रम है।क्यों?।क्योँकि हम आज भी मानसिक गुलाम है।हम स्वयं कोई भी मूल -ज्ञान या ग्रंथ पढ़ना नहीं चाहते ।बाबासाहब ने यह पहचाना था।उन्होंने नफरत नही सिखाई तो जब तक आप काबिल नहीं बनते तब तक दुरी बनाए रखने को कहां। बाबासाहेब सही थे आज भी हम मानसिक गुलाम है ।हम हमें बचाने के लिए कोई अवतार जन्म लेगा इसी आशा में बैठे है।आज कहीं न कहीं तो कमीं है।इसीलिए 60 साल के बाद भी आज दलित समाज बाबासाहेब के बाद उनके जैसे निस्वार्थी और ज्ञानी पढ़े लिखे लोगों को वह लोकनेता नहीं बना सका जो अपने पावर से नहीं विचारों से दुनियां को प्रभावित करता हो ,दुःख इस बात का है बाबासाहेब जैसे हजारो लोग दलित समाज में है लेकिन वह सिर्फ कार्यकर्ता बन सकते है दलित नेता नहीं क्योंकि की समाज आज भी मानसिक गुलाम है।वह सिर्फ चमत्कार या अवतार की राह देख रहा है।समाजसेवी लोगों को सराह नहीं रहा है,यह धार्मिक अंध श्रद्धा का साइड इफेक्ट(मानसिक गुलामी)है।कर्म के मार्ग पर कोई जाना ही नही चाहता।आरक्षण का फायदा जिन्होंने उठाया उनमें एक उच्य वर्ग बन रहा है जो सिर्फ अपने परिवार को लाभ पहुंचाने के बारे में ही सोच रहा है ।जो झोपड़ी में रहनेवाले गरीब से भी गरीब दलित तक लाभ पहुचाना नहीं चाहता ।बाबासाहेब यही वर्ण और वर्ग वादी मानसिकता को बदलना या उच्य-नीचता की सोच को बदलना चाहते थे।नफरत फैलाना नहीं। वह तो सामाजिक अभिसरण चाहते थे।