देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?

*देश में बढ़ रही नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार कौन?*

आज हम नफ़रत के बारे में माल मसालेदार चर्चा नहीं करेंगे ।समस्या के जड़ तक जाने की कोशिश करेंगे।लगभग ३० साल पहले बचपन में मेरे इतिहास पढाने वाले अध्यापक जी ने एक बात बताई थी “सच्चा अध्यापक वहीं होता है जो संतुलित हो जो सिक्के के दो पहलुओं के साथ समान न्याय कर सके सदा संतुलित रहें।छात्रों को दोनों बाजुओं (पक्षों को )समझाए”।यह नियम सभी विषयों के लिए लागू होता है,लेकिन आज के हमारे समाज का दुर्भाग्य यह है हर बुद्धिवादी अथवा लेखक किसी न किसी विचार धारा से इतना प्रभावित हो गया है की मानो वह सेल्समन बन गया है । उन की आजादी पर मै आज उगली नहीं उठा रहा हूँ क्योंकि उन्हें आजादी का पूरा अधिकार है.मैं उनका पूरा आदर सम्मान करता हूँ। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है की सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी की दिशाहीन करने का काम कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने किया है ।आपने व्यक्तिगत रुचि (like /dislike) को उन्होंने युवकों के उपर थोपा. यह भूल गये की उन्हें सरकार से मिलने वाला लाखो रुपयों का मासिक वेतन अपनी वैयक्तिक विचार धारा को थोपने के लिए नहीं मिलता। किसी विचार धारा का विरोध करने के लिए नहीं मिलता। आप इस देश के अलग अलग विचार धारा के नागरिकों के tax payer के नौकर हो फिर भी उन्होंने उन के साथ गद्दारी की।आज सरकारी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को एक एक कट्टर विचारधारा का अड्डा बना दिया।जो सिर्फ ज्ञान का श्रोत (source )होना चाहिए था ।इन अध्यापकों या प्रोफेसरों का काम न्यायाधीश के भाँती न्याय करना नहीं तो दोनों परस्पर विरोधो विचारों का समझाना था। संतुलित न्याय बुध्दी ही छिन ली इन प्रोफेसरों ने,बाकी बचे अद्यापकों में कई तो भ्रष्टाचार की संतान है ,जो हवा की तरह रुख बदल कर जान बचाते हैं।ऐसा संशोधन करते है जिन किताबों की 25 या 50 प्रिंट निकलती है ।जो उनके अपने घर में ही दिखती है। साल में 10-12 लाखऔर 10 साल में लगभग 1 करोड़ वेतन वालों पेटू लोगों का बॉयोडाटा देखो 10-15 सालों में सिर्फ 4-5 लेख छपवाए होंगे।कुँए में नहीं है तो बाल्दी में कहाँ से आएगा?परिणाम स्वरूप साक्षरों(युवकों का) अज्ञान -निरक्षरों तक पहुँचा आज भारत के ९०% लोगों में जो नफऱतका भाव है।मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।उस का कारण उनका इकतरफा विकास है।लोग समझतें है कि मेरी विचारधारा का विकास तब ही हो सकता है जब मै सामनेवाली विचारधारा से नफरत करूंगा। आज की TV या प्रिंट मिडिया का भी संतुलन बिगड़ गया है वह अपने आप को न्यायाधीश समजने लगें है.।कमजोर इन्सान की तरह सिर्फ एकतरफा बाते करते है.अरे !सुंदर फूलों की माला तभी बन सकती है जब उसमें सभीं रंगों के फुल हो।इसी प्रकार का सरल जीवन होता है.उसे हमने जटिल बनाया है।इतिहास में एक नेता सामाजिक न्याय के लड़ रहा था ,तो दूसरा राजनीतिक न्याय के लिए, तीसरा संस्कृति की रक्षा के लिए।वह सारे लोग/नेता हमें -हर एक को अपनी जगह पर सही दिखाई देंगे जब हम दूसरे रंग के/ या अपने व्यक्तिगत चश्में से नहों देखेंगे।सही ज्ञानी उसी को कहते है जो संतुलित विचार रखता हो।जब यह होगा तब ही समाज समस्या रहित होगा।
-लेखन राजेन्द्र राणे (speechobook@WordPress.com)

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