अनाथों का नाथ फिर भी अनाथ -महात्मा गाँधी

मेरे साथियों !
सब से पहले मै आप का तहे-दिल से
हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।
क्योंकि आप आज……
हिम्मत-जिगर दिखाकर
ऐसे लोकनेता के बारे में
विचार पढने के लिए तैयार हुए,

जिस लोकनेता की अवस्था
इस समाज ने
बेसहारा…,
बेचारा…. ,
असहाय्य…. जैसी की है ।
कट्टरतावादी सामाजिक प्रवाह
मुझे से नाराज होगा…
यह मालूम होते हुए भी,
मै जानबूझ कर….
ऐसे लोकनेता के बारे में
बोलने जा रहा हूँ,

जो आजाद भारत में
सबसे ज्यादा ‘बद-नसीब’…
लोक-नेता रहा।
जिसके पीछे कोई भी
व्यक्ति,नेता,या पार्टी
सच्ची श्रध्दा भावना से
कभी खड़ी नहीं हुई।
उन के नाम पर
गलतफहमिया फैलाई गयी।
हर कोइ उस लोकनेता के नाम
‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ की तरह
इस्तेमाल कर रहा है।
या ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’…. की तरह
उस लोकनेता के नाम को
बरबाद कर रहा है।
जरूरत के हिसाब से
उपयोग में ला रहा है
‘यूज़ एंड थ्रो’…. कर रहा है
उस लोकनेता का फोटो
जिसपर है उस… 500 और
1000 रुपयों नोटों को तो
प्यार से अपनाता है;
लेकिन, व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से…
बड़ी नफरत करता है
ऐसा क्या हुआ ?….
उस लोकनेता ने किया क्या?….
की हम इतनी नफरत करते है ?
उस महामानव ने लोगों को लूटा नहीं….
अपने ‘खानदान को राजनीति’ में
आगे बढ़ाने की कोशिश नही की….
कोई प्रॉपर्टी खड़ी नही की….
देश आजाद होने के बाद
आराम से राष्ट्रपति बन सकते था
लेकिन उस लोकनेता ने राष्ट्रपिता बनाना पसंत किया।
सम्पूर्ण जिंदगी स्वयं व्यक्तिगत रूप से
कोई फायदा नहीं उठाया।
न -अपने सगे बेटे को भी उठाने नही दिया।
क्या, वह… उनकी गलती थी ?
लेकिन वह लोकनेता उस वक्त करोड़ो देशभक्तों के आँखों का तारा था।
आज आजादी के साठ साल के बाद
भारतीय लोगों के अंदर
उस लोकनेता के बारे में
आज जहर… आया कहाँ से ?
इस सब बातों के मूल कारण को…
मै समझता हूं ,मै मानता हूँ।
हम में से स्वयं घोषीत- महाबुद्धिमान
बढ़ते जा रहे है, या
पढ़े लिखे परबुद्धि गवार लोगों का अज्ञान
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