छ.शिवाजी – क्यों है सर्वश्रेष्ठ?

छ.शिवाजी ही है इसीलिए सर्वश्रेष्ठ.

जब उस वक्त- भारत-वर्ष के

बाकी सारे राजाधिराज,

चक्रवर्ती, सम्राट, बादशाह या नबाब

सारी जिन्दगी,  अधनंगे, भूखे, लाचार,

कंगाल, जनता जनार्दन के उम्मीदों का

गला घोंटकर, उनकी पसीने की कमाई

निर्लज्यता से उड़ा रहें थे।

तब

सह्याद्री पर्वत के जंगलों में १६ वर्ष का

शिवाजी भोसले नाम का नौजवान,

रोहिडेश्वर के मन्दिर में,

आज़ादी की प्रतिज्ञा ले रहा था।

स्वयं की करंगुली काटकर,

अपना खून बहाकर,

धरती को दुल्हन की तरह

सजाने की कोशिश कर रहा था।

बार-बार की लड़ाइयों के कारण,

सारे गाँव-शहर, जलकर

भस्म हो गए थे,

खंडहर बन गए थे,

उन में जंगली जानवरों का संचार था,

जिस पुणे शहर में, विदेशियों ने

गधे से हल चलाकर,

किसानों की परंपरा को

ज़िन्दा जलाया था।

अपमानित किया था,

उसी पुणे शहर में

सोने का हल चलाकर,

शिवाजी महाराज ने उन किसानों को

स्वाभिमान की भाषा दी।

मन से मरे मराठों के तन-मन में,

नव चेतना जागृत की।

विदेशियों की गुलामी करने वाले,

मुजरा या लावणी के घुंगरू से भी

घायल होनेवाले, नौजवानों के नसों में,

लाचारी एवं अगतिकता के कारण।

खून नाम का पानी दौड़ रहा था,

उसे बाल शिवाजी नाम की

चिंगारी ने डफली की थाप

और तलवार की खनखनाहट में

खौल कर बहने वाला खून बना दिया।

उनका ‘हिन्दवी‘…. शब्द का अर्थ

विरोध प्रदर्शक नहीं था,

वह सर्व-समावेशक था।

जहाँ मुगलों के सत्ता-पिपासु शहज़ादे,

सत्ता सुन्दरी के उपभोग के लिए,

अपने जन्मदाता के खून के भी प्यासे थे।

भाई-भाई का गला काटकर

रक्त रंजीत इतिहास बना रहा था।

धन संपत्ति को बनाए रखने के लिए,

विजातीय एवं विदेशी शत्रुओं से भी

बहनों एवं बेटियों की शादियाँ रचाकर,

रिश्तेदारी की घिनौनी परंपरा

वफ़ादारी से निभाने वाले तथाकथित

खानदानी  यहाँ पनप रहे थे।

जब धर्म का अर्थ

धन संपत्ति के लिए, स्व एवं परधर्मियों

की जान लेना बन गया था,

तब शिवाजी महाराज ने

जान के लिए जान देने का

स्वराज धर्म सिखाया।

………………

……………..speech by राजेंद्र राणे

Ref –
Shivaji Maharaj,(Part-1) Speech by Rajendra Rane
(on Youtube videos )

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